मर्यादा का धर्म -
श्रीराम ने कभी उपदेश नहीं दिया, लेकिन उन्होंने अपने सात्विक व्यवहार से उदांत आदर्शों का जो महाकव्य रचा, वह विश्वभर के लिए अनुकरणीय हो गया है। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। भारतीय चिंतन में मर्यादाओं को धर्म का आधार कहा गया है। सप्त मर्यादाएं मानव को श्रेष्ठतम जीवन प्रदान करती हैं।
हमारे ऋषि कहते हैं कि आपके जीवन के अतिरिक्त भी जीवन है। जो दायित्व हम स्वयं के लिए अनुभव करते हैं, उससे अधिक दायित्व उस जीवन के लिए होते हैं, जो अल्प सीमा से बाहर है। प्राणी मात्र के कल्याण के लिए सदा क्रियाशील रहना और ईश्वर पर परम आस्था प्रकट करते हुए सदाचारपूर्ण जीवन के साथ लोक कल्याण के पावन कार्यों में स्वयं को लगा देना ही वास्तविक धर्म का ध्येय है। व्यक्ति आत्मसंतुष्टि के लिए अनैतिकता और मर्यादित व्यवहार का आचरण न करें, वह स्व की संकीर्ण परिधि से बाहर निकलकर पर के कल्याण हेतु सक्रिय रहे, इसलिए हमारे मनीषियों ने यम, नियम और तथा सप्त मर्यादाओं की व्यवस्था की है। जीवन में वह सब कुछ सत्य नहीं है, जो हमें प्रिय है या हमारे लिए उपयोगी है। सत्य की सीमा में प्रिय-अप्रिय और उपयोगी-अनुपयोगी सभी तत्व आते हैं, इसलिए ही बिना किसी भेदभाव के हमें सबके प्रति समदृष्टि रखनी चाहिए।
नियन्त्रणहीनता मानव को स्वेच्छाचारी बना देती है, इसलिए कहा गया है कि सात्विक जीवन निर्वाह के लिए उन बातों से दूर रहना चाहिए, जो किसी के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं या हानिकारक होती हैं। प्रत्येक व्यक्ति महान बने, वह मानव होने के अर्थ को सार्थक करे, इसलिए मर्यादित जीवन को ही संत जीवन कहा गया है। कालोना का शासक स्टीफेन फ्रांस से पराजित हो गया। उसे बंदी बनाकर पैरिस लाया गया। वह लोहे की कठोर शृंखलाओं में जकड़ा हुआ था।
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